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पढ़ाई में मन कैसे लगाएं: वजह पहचानें, रूटीन बनाएं और डांट के बिना नतीजे पाएं

शिक्षा और सीखना · theAsianparent

दो लाइन का होमवर्क 45 मिनट खींचता है और स्कूल के वॉट्सऐप ग्रुप में 'मेरी बेटी को 98' चमक रहा है — ऐसे में क्या करें: उम्र के हिसाब से पढ़ाई के टुकड़े, 4:30 से 9:15 का नमूना टाइमटेबल और वे वाक्य जो सच में काम करते हैं।

दो लाइन का होमवर्क, पैंतालीस मिनट और वह वॉट्सऐप ग्रुप

शाम के छह बज गए हैं। कॉपी खुली है, उस पर दो लाइनें लिखी जानी हैं — बस दो। आठ साल का रुद्र पिछले पैंतालीस मिनट से पेंसिल घुमा रहा है, दो बार पानी पी आया है, एक बार रबर ढूंढने गया है और अब कह रहा है 'पेट दर्द हो रहा है।' उसी वक्त मां का फोन बजता है: स्कूल के वॉट्सऐप ग्रुप में किसी ने रिपोर्ट कार्ड की फोटो डाली है और नीचे लिखा है 'मेरी बेटी को 98'। बीस बधाई के संदेश आ चुके हैं।

अगले दो मिनट में जो होता है, वह तय करता है कि आज की शाम बचेगी या नहीं। 'देखो उसे, और एक तुम हो' — यह वाक्य निकल जाना बहुत आसान है, और यही वाक्य रुचि की सबसे तेज़ हत्या करता है। 'मन नहीं लगता' कोई बीमारी नहीं, एक लक्षण है; और लक्षण की जड़ें आमतौर पर पांच-छह जगहों में से किसी एक में होती हैं।

एक हफ्ता सिर्फ जासूसी कीजिए, बिना टोके: किस विषय पर टालता है, किस समय, कैसे टालता है (पानी, टॉयलेट, पेट दर्द, नींद), और कब बिना कहे खुद बैठ जाता है। ज़्यादातर माता-पिता को यह पैटर्न सात दिन में साफ दिख जाता है — और तब इलाज 'ज़्यादा डांट' नहीं, कोई एक ठोस बदलाव निकलता है।

पहले वजह ढूंढें: नींद, नज़र, समझ या डर

सबसे पहले शरीर की जांच कीजिए, क्योंकि यहां सबसे आसान जीत छिपी होती है। नींद का हिसाब सीधा है: 6-12 साल के बच्चे को रोज़ 9 से 11 घंटे और किशोरों को 8 से 10 घंटे नींद चाहिए। रात 11 बजे सोकर सुबह 6 बजे उठने वाला बच्चा शाम को पढ़ नहीं सकता, चाहे कितनी भी डांट पड़े। इसी तरह आंखों और सुनने की जांच करा लीजिए — क्लास में बोर्ड साफ न दिखना 'मन न लगने' की हैरान करने वाली आम वजह है, और चश्मा लगते ही कई बच्चों के नंबर अपने आप सुधर जाते हैं।

दूसरी बड़ी वजह है समझ का पीछे छूट जाना। कक्षा 4 का बच्चा अगर पहाड़े या भाग नहीं जानता, तो कक्षा 4 का गणित उसके लिए दीवार है — और दीवार के सामने कोई भी बैठना टालेगा। एक शांत शाम में पिछली कक्षा का सवाल देकर देखिए। बुनियाद में छेद मिले तो रोज़ 15 मिनट सिर्फ उसी छेद की मरम्मत कीजिए, आज का होमवर्क अलग से।

तीसरी वजह अपेक्षा का ढांचा है। ध्यान टिकने का मोटा हिसाब याद रखिए — उम्र के हर साल पर लगभग 2 से 4 मिनट। यानी 8 साल के बच्चे से एक बार में 16-30 मिनट टिकने की उम्मीद रखना ठीक है, दो घंटे बिठाना नहीं। और अगर स्कूल जाने से डर, अचानक गिरते नंबर, पेट दर्द-सिरदर्द की रोज़ की शिकायत या रात को रोना दिख रहा है, तो वजह पढ़ाई नहीं — दोस्ती, कोई टीचर या बुलीइंग हो सकती है। डांटने से पहले नरम बातचीत, ज़रूरत पर क्लास टीचर से मुलाकात।

रूटीन और माहौल: आधी लड़ाई यहीं जीती जाती है

पढ़ाई का समय रोज़ एक जैसा रखिए। रोज़ बदलता समय हर दिन एक नई बहस पैदा करता है; तय समय दो हफ्तों में आदत बन जाता है और बहस अपने आप खत्म हो जाती है। साथ में जगह भी तय हो — एक मेज़, एक कुर्सी, सामने दीवार, अच्छी रोशनी और पीठ के पीछे दरवाज़ा नहीं। बिस्तर पर लेटकर पढ़ना दिखने में आराम है, पर वहां दस मिनट में नींद या फोन आ जाता है।

पढ़ाई को टुकड़ों में बांटिए: कक्षा 1-5 के लिए 20-25 मिनट पढ़ाई और 5 मिनट ब्रेक, कक्षा 6-8 के लिए 30-35 मिनट और 5-10 मिनट ब्रेक, कक्षा 9 से ऊपर 40-45 मिनट। ब्रेक में फोन नहीं — पानी, बालकनी का चक्कर, कुछ खाना, या बस टहलना; एक बार शॉर्ट्स खुल गए तो पांच मिनट का ब्रेक पैंतीस मिनट का हो जाता है। हर टुकड़े से पहले काम को छोटा और साफ लिख लीजिए: 'गणित के 5 सवाल', न कि 'गणित करना है'।

मेज़ पर सिर्फ उसी विषय का सामान रहे, बाकी सब बाहर। और सबसे मुश्किल शर्त: पढ़ाई के उन घंटों में घर का टीवी बंद और माता-पिता का फोन भी दूर। जिस घर में बाकी सब हंस-हंसकर रील देख रहे हों, वहां आठ साल के बच्चे से एकाग्रता की उम्मीद रखना बेईमानी है। छोटे भाई-बहन हैं तो उन्हें भी उसी समय ड्रॉइंग या किताब दे दीजिए — घर में एक 'शांत घंटा' बना दीजिए।

रुचि जगाने की तरकीबें और वे वाक्य जो काम करते हैं

पढ़ाई को ज़िंदगी से जोड़िए। गिनती और प्रतिशत सब्ज़ी मंडी में — 'दो किलो प्याज़ 60 रुपये किलो, 500 का नोट दिया तो कितने वापस?'; विज्ञान रसोई में — दूध फटना, कुकर की सीटी, बर्फ का पिघलना; भूगोल टिकट और नक्शे पर। जो बच्चा किताब में 'लाभ-हानि' से भागता है, वह दुकान के हिसाब में वही सवाल हंसते हुए कर लेता है।

सबसे मजबूत तरकीब है उल्टी क्लास: बच्चे को 'टीचर' बना दीजिए और आप 'कमज़ोर छात्र' बन जाइए। 'मुझे तो समझ ही नहीं आया, प्रकाश का परावर्तन ज़रा फिर से पढ़ाओ' — और बीच में एक-दो गलत सवाल पूछिए। जो सिखा सकता है, वह समझ चुका है, और याद रखने की दर पढ़ने भर से कई गुना ज़्यादा हो जाती है। इसी तरह किताब बंद करके याद करने की कोशिश (रिकॉल) बार-बार पढ़ते रहने से कहीं बेहतर काम करती है — 10 मिनट पढ़ाई, फिर 3 मिनट किताब बंद करके बताना।

तारीफ नतीजे की नहीं, मेहनत की कीजिए। '90 आ गए, तुम तो होशियार हो' के बजाय 'तुमने रोज़ आधा घंटा दिया, इसी का नतीजा है' — पहले वाक्य से बच्चा नंबर गिरने पर टूटता है, दूसरे से उसे अपने प्रयास पर भरोसा बनता है। और जब बच्चा कहे 'मुझे नहीं आता', तो इसे बहाना मानने से पहले यह कहकर देखिए: 'अभी नहीं आता। चलो, सिर्फ पहला सवाल साथ में करते हैं, बाकी चार तुम।' अटकने पर 'फिर पढ़ो' नहीं, 'कौन-सी लाइन पर अटके, वहीं से देखते हैं।' और नंबर कम आने पर पहला वाक्य कभी तुलना का न हो — 'कहां गलती हुई, चलो साथ देखते हैं' से बच्चा कॉपी छिपाना बंद कर देता है।

4:30 से 9:15 का नमूना टाइमटेबल (और ट्यूशन वाले दिन का बदलाव)

कक्षा 3-7 के बच्चे के लिए एक ऐसा ढांचा जो ज़्यादातर घरों में चलता है — 4:30-5:00 स्कूल से लौटकर खाना और आराम, कोई सवाल नहीं, कोई 'होमवर्क कितना है' नहीं। 5:00-6:00 बाहर खेल — यह सबसे ज़रूरी घंटा है, कटौती इसी की सबसे पहले होती है और नुकसान भी सबसे ज़्यादा यहीं का है। 6:00-6:25 पहला ब्लॉक: सबसे मुश्किल विषय, क्योंकि दिमाग अभी ताज़ा है। 6:25-6:30 ब्रेक। 6:30-6:55 दूसरा ब्लॉक: लिखने वाला काम। 6:55-7:10 लंबा ब्रेक। 7:10-7:35 तीसरा ब्लॉक: याद करने वाला विषय, ज़ोर से बोलकर।

7:35-8:15 फ्री समय या स्क्रीन (अगर उस दिन का कोटा बचा है)। 8:15-8:45 परिवार का खाना, टीवी बंद। 8:45-9:00 कल के लिए बैग जमाना, डायरी देखना और मेज़ साफ करना — यह पंद्रह मिनट सुबह की आधी भागदौड़ बचा देता है। 9:00-9:15 किताब या कहानी, फिर लाइट बंद। कुल पढ़ाई: करीब सवा घंटा, तीन साफ टुकड़ों में — और यह उस दो घंटे की जबरन बैठक से कहीं ज़्यादा काम करता है जिसमें से पचास मिनट पेंसिल घुमाने में जाते हैं।

ट्यूशन वाले दिन का बदलाव: अगर ट्यूशन 5:00-6:30 है, तो घर की पढ़ाई सिर्फ एक ब्लॉक रखिए — 7:00-7:25 — और उसमें वही करवाइए जो ट्यूशन में नहीं हुआ। ट्यूशन के बाद दोबारा दो घंटे बिठाना सबसे आम गलती है; बच्चा दिन के सात घंटे स्कूल और डेढ़ घंटे ट्यूशन पहले ही कर चुका है। ट्यूशन तभी रखिए जब कोई एक विषय सचमुच पीछे हो, और हर दो महीने पर पूछिए कि क्या सुधार दिख रहा है। हर विषय के लिए ट्यूशन का मतलब अक्सर यह होता है कि बच्चा स्कूल में सुनना छोड़ देता है, क्योंकि उसे पता है 'शाम को तो पढ़ाया ही जाएगा'। बोर्ड की कक्षाओं में ब्लॉक 45 मिनट के कर दीजिए, पर खेल और नींद के घंटे तब भी मत काटिए।

दादी-नानी कहती हैं vs आज का विज्ञान

'सुबह 4 बजे उठकर पढ़ो, ब्रह्म मुहूर्त में सब याद होता है' — सुबह का शांत समय सचमुच अच्छा है, पर तभी जब बच्चा रात 9 बजे सो जाए। रात 11:30 बजे सोकर 4 बजे उठना यानी साढ़े चार घंटे की नींद, और नींद ही वह समय है जब दिन में पढ़ी बात दिमाग में पक्की होती है। कटी नींद के साथ पढ़ी गई तीन घंटे की पढ़ाई पूरी नींद के एक घंटे से हार जाती है।

'तुलना से बच्चा सुधरता है' और 'दो थप्पड़ पड़ेंगे तो अपने आप पढ़ने लगेगा' — दोनों गलत हैं। तुलना से मुकाबला नहीं, हार मान लेने की आदत बनती है, और मार से बच्चा किताब से नहीं, आपसे दूरी बनाना सीखता है। स्कूल के वॉट्सऐप ग्रुप वाली दौड़ में शामिल होने से पहले याद रखिए कि हर घर सिर्फ अपना सबसे अच्छा नंबर पोस्ट करता है, बाकी हिस्सा कभी नहीं।

बड़ों की कई बातें आज के शोध पर खरी उतरती हैं: रोज़ एक ही समय पर पढ़ना-खाना-सोना, ज़ोर से बोलकर याद करना, हाथ से लिखकर अभ्यास करना, बच्चों को कहानियां सुनाना, और शाम को बाहर भेज देना। दादा-दादी का सबसे बड़ा योगदान यही हो सकता है — रोज़ 20 मिनट बच्चे से किताब पढ़वाना या कहानी सुनाना, बिना नंबर की बात किए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: बच्चा पढ़ते-पढ़ते बार-बार उठ जाता है — क्या यह ध्यान की गड़बड़ी है? — ज़्यादातर बच्चों में यह सिर्फ बहुत लंबा बैठाया जाना होता है; ब्लॉक छोटे कीजिए और उठने की वजहें पहले ही हटा दीजिए (पानी की बोतल, पेंसिल, रबर सब मेज़ पर, टॉयलेट पहले)। लेकिन अगर बेचैनी घर, स्कूल और खेल — तीनों जगह दिखे, दो साल से चल रही हो और पढ़ाई सचमुच पिछड़ रही हो, तो स्कूल काउंसलर या बाल विशेषज्ञ से जांच करा लेना समझदारी है।

सवाल: पढ़ाई के लिए इनाम देना ठीक है या नहीं? — नंबरों पर पैसे या महंगे तोहफे जोड़ने से बचिए; इससे बच्चा सीखने में नहीं, सौदे में दिलचस्पी लेने लगता है। इसके बजाय आदत को इनाम दीजिए — 'इस हफ्ते रोज़ बिना कहे बैठे, इसलिए रविवार को तुम्हारी पसंद की जगह जाएंगे।' छोटे बच्चों के लिए स्टार चार्ट ठीक है, पर हफ्ते भर से लंबे लक्ष्य मत रखिए।

सवाल: बोर्ड परीक्षा से पहले बच्चा घबराता है और रोने लगता है — क्या करें? — 'कुछ नहीं होगा, आराम से पढ़ो' कहने से चिंता कम नहीं होती। उसे कागज़ पर बांटिए: कौन-से अध्याय बचे हैं, हर दिन कितने, कौन-से पेपर हल करने हैं — अनजाना डर सूची में बदलते ही छोटा हो जाता है। रोज़ आधा घंटा बाहर, पूरी नींद और परिवार का खाना परीक्षा के महीने में भी न रुके। और घर में यह वाक्य साफ बोल दीजिए: 'नंबर जो भी आएं, तुम हमारे लिए वही रहोगे।' नींद न आना, खाना छूटना या रोज़ की घबराहट लंबी चले तो काउंसलर से मिलना बिल्कुल सामान्य कदम है।

सवाल: बच्चे को ऑनलाइन होमवर्क के लिए फोन चाहिए, पर फिर वह घंटों उसी में लगा रहता है — बीच का रास्ता क्या है? — फोन के बजाय लैपटॉप या बड़ी स्क्रीन दीजिए और उसे हॉल में रखिए, बंद कमरे में नहीं। काम शुरू करने से पहले तय कीजिए कि क्या करना है और कितने मिनट में, टाइमर बच्चे से लगवाइए, और काम पूरा होते ही डिवाइस तय जगह पर वापस — यही एक नियम रोज़ के घंटों की बहस खत्म कर देता है।

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