इंग्लिश-मीडियम स्कूल के इंटरव्यू में बच्चा हिंदी में जवाब दे दे — यह नुकसान नहीं है। जागने के 20-30% घंटे का नियम, बच्चा इंग्लिश में जवाब दे तो क्या कहें, और रोज़ 45 मिनट में दोनों भाषाएं मजबूत रखने का तरीका।
गुड़गांव के एक इंग्लिश-मीडियम स्कूल के एडमिशन इंटरव्यू में टीचर ने साढ़े तीन साल के बच्चे से पूछा — ‘What is your name, beta?’ बच्चे ने बिना अटके जवाब दिया, ‘मेरा नाम अद्विक है और मैं साढ़े तीन साल का हूं।’ मां के कान गरम हो गए। घर लौटते ऑटो में उसने वही सोचा जो लाखों मांएं सोचती हैं — ‘हमने घर में हिंदी बोलकर गलती कर दी।’
उस कमरे में असल में जो हुआ, वह उलटा था। बच्चे ने अंग्रेज़ी का सवाल समझा, सही जानकारी दी और पूरा वाक्य बनाया — बस उस भाषा में जिसमें वह सबसे सहज है। भाषा विकास में समझना हमेशा बोलने से आगे चलता है; जो बच्चा दो भाषाएं सुन और समझ रहा है, उसका दूसरी भाषा में बोलना कुछ महीनों की बात है, सालों की नहीं।
असली सवाल कन्फ्यूज़न का नहीं, हिस्से का है — दिन में किस भाषा को कितने घंटे मिल रहे हैं। और इस हिसाब में इंग्लिश-मीडियम स्कूल जाने वाले बच्चों के साथ जो होता है, वह ज़्यादातर मां-बाप की चिंता से उलटा है: खतरे में इंग्लिश नहीं, हिंदी होती है।
भाषा शोध का एक सीधा-सादा नियम याद रखने लायक है — किसी भी भाषा को बच्चे में ज़िंदा और बढ़ती हुई रखने के लिए उसे जागने के कुल घंटों का कम से कम 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा चाहिए। चार साल का बच्चा दिन में करीब 12 घंटे जागता है, यानी हिंदी को रोज़ ढाई से साढ़े तीन घंटे। सुबह 7 से 8 का नाश्ता, शाम 6 से 7 का खेल और रात 8:30 से 9 की कहानी — तीन टुकड़े मिलाकर यह लक्ष्य बिना किसी अलग क्लास के पूरा हो जाता है।
उम्र के मील के पत्थर दोनों भाषाओं को जोड़कर गिने जाते हैं, अलग-अलग नहीं। दो साल तक करीब 50 शब्द और दो-शब्द के जोड़े (‘पानी दो’, ‘more milk’) अपेक्षित हैं — इनमें 30 हिंदी के हों और 20 इंग्लिश के, तब भी गिनती 50 ही है। तीन साल तक तीन-चार शब्दों के वाक्य बनने चाहिए और किसी अजनबी को बच्चे की आधी से ज़्यादा बात समझ आनी चाहिए।
बीच-बीच में भाषाएं मिलाना (‘मम्मा, मुझे वॉटर चाहिए’) बीमारी नहीं, दो से चार साल की उम्र का सामान्य पड़ाव है और अपने आप छंटता है। चिंता तब कीजिए जब दोनों भाषाओं की कुल शब्द-संख्या बढ़ना रुक जाए, बच्चा पहले सीखे हुए शब्द भूलने लगे, इशारे करना बंद कर दे, या नाम पुकारने पर बार-बार पलटकर न देखे — ऐसे में भाषा बदलने की नहीं, कान की जांच और स्पीच थेरेपिस्ट से मिलने की ज़रूरत है।
सबसे भरोसेमंद ढांचा ‘एक व्यक्ति, एक भाषा’ है: मम्मा हमेशा हिंदी में, पापा हमेशा इंग्लिश में। जिन घरों में दोनों को इंग्लिश सहज नहीं आती — और भारत में ऐसे घर बहुसंख्यक हैं — वहां ‘जगह के हिसाब से भाषा’ बेहतर चलता है: घर की चारदीवारी में हिंदी, और स्कूल, ट्यूशन व किताबें इंग्लिश। जो भी चुनें, कम से कम तीन-चार महीने बदलिए मत; नियम पकड़ते ही बच्चे का दिमाग दोनों भाषाओं के खाने अलग-अलग रखने लगता है।
बच्चा इंग्लिश में जवाब दे तो सबसे कारगर तरीका है दोहराकर लौटाना, जिसे भाषा विज्ञान में रीकास्ट कहते हैं — टोकना नहीं, वाक्य को हिंदी में लौटा देना। बच्चा: ‘Mumma, I want water.’ आप: ‘अच्छा, पानी चाहिए? बोलो — मुझे पानी चाहिए।’ और पानी दे दीजिए, चाहे उसने दोहराया हो या नहीं। ‘हिंदी में बोलो’ डांटकर कहने से बच्चा हिंदी को सज़ा से जोड़ लेता है; दोहराकर लौटाने से वह उसे प्यार और पानी से जोड़ता है। यही तरीका इंग्लिश में भी चलता है — ‘She goed to school’ पर सुधार नहीं, बस ‘Yes, she went to school!’
एक आदत जो सबसे ज़्यादा नुकसान करती है, वह है एक ही वाक्य के भीतर दोनों भाषाएं घोल देना: ‘बेटा जल्दी shoes पहनो, हम late हो रहे हैं।’ बच्चा ठीक वही मिश्रण सीखता है और उसे ‘जूते’ और ‘देर’ जैसे शब्द कभी सुनने को ही नहीं मिलते। वाक्य पूरा एक भाषा में रखिए; भाषा बदलनी हो तो वाक्य खत्म करके बदलिए।
यह द्विभाषी परवरिश की सबसे आम शिकायत है और इसका नाम है निष्क्रिय द्विभाषिता — समझ पूरी, बोलना शून्य। दिल्ली या इंदौर की किसी कामकाजी मां का दिन देख लीजिए: सुबह 8 से शाम 7 तक बच्चा डे-केयर और स्कूल में इंग्लिश सुनता है, और घर पर जो ढाई घंटे बचते हैं उनमें से एक घंटा होमवर्क में जाता है — जो इंग्लिश में है। हिंदी को बोलने का मौका ही नहीं मिलता।
इसका इलाज बच्चे को ऐसे काम देना है जो हिंदी के बिना पूरे ही न हों। सब्ज़ी वाले से तीन चीज़ें उसी से मंगवाइए — ‘भैया, आधा किलो टमाटर और एक गड्डी धनिया दे दो।’ रात के खाने पर ‘आज स्कूल में क्या हुआ’ का जवाब सिर्फ हिंदी में लेने का पांच मिनट का नियम बनाइए। लिफ्ट में मिलने वाली आंटी को नमस्ते हिंदी में कहलवाइए। हफ्ते भर में बोलने के ये छोटे-छोटे मौके गिनकर पंद्रह-बीस हो जाते हैं, और यही असली अभ्यास है।
दादी-नानी इस मामले में सबसे बड़ी ताकत हैं, बशर्ते बात एकतरफा न रहे। रोज़ या हफ्ते में तीन बार 15 मिनट का वीडियो कॉल तय कीजिए और दादी से कहिए कि वे कहानी सुनाने के साथ सवाल भी पूछें — ‘आज टिफिन में क्या ले गया था?’, ‘तेरे दोस्त का नाम क्या है?’ जवाब देने के लिए बच्चे को हिंदी के पूरे वाक्य बनाने पड़ते हैं। जिस घर में दादी की कहानियां चलती रहती हैं, वहां हिंदी छूटती नहीं।
रोज़ के दो तय टुकड़े: नाश्ते के 20 मिनट पूरी तरह हिंदी में — न टीवी, न फोन; और सोने से पहले 15 मिनट की हिंदी कहानी, चाहे किताब से हो या मुंहज़बानी। दोनों मिलाकर रोज़ 35 मिनट, बिना किसी अलग क्लास या ऐप के।
सोमवार, बुधवार, शुक्रवार: दादी या नानी से 15 मिनट का वीडियो कॉल, जिसमें बच्चा दिन की तीन बातें खुद बताए। मंगलवार और गुरुवार: 10 मिनट की इंग्लिश पिक्चर बुक मम्मा या पापा के साथ — रोज़ का यह पढ़ना दूसरी भाषा का सबसे तेज़ रास्ता है, ट्यूशन से भी तेज़। शनिवार: हिंदी में कोई एक कार्टून या फिल्म, सब साथ बैठकर और बीच-बीच में बात करते हुए, क्योंकि अकेले देखी गई स्क्रीन से भाषा नहीं आती। रविवार: रसोई में मदद — ‘दो प्याज़ छीलो’, ‘चम्मच से हिलाओ’, ‘कटोरी ऊपर वाले खाने में रखो’ — रोज़मर्रा की हिंदी क्रियाएं यहीं आती हैं।
खर्च मामूली है: 300 से 500 रुपये में हिंदी की चार-पांच चित्र-कथा किताबें आ जाती हैं, और नगर निगम या स्कूल की लाइब्रेरी में हिंदी बाल-साहित्य अक्सर मुफ्त मिल जाता है। हर तीन महीने में बच्चे के दस नए हिंदी शब्द एक कागज़ पर लिखकर फ्रिज पर चिपका दीजिए — जब बढ़त दिखती है तो प्लान चलता रहता है।
‘घर में भी इंग्लिश ही बोलो, वरना बच्चा पीछे रह जाएगा’ — यह आज की सबसे महंगी सलाह है और यह उलटी है। जिस बच्चे की पहली भाषा मजबूत होती है, वह दूसरी भाषा तेज़ी से सीखता है, क्योंकि विचार बनाने का ढांचा एक बार बन चुका होता है। टूटी-फूटी इंग्लिश घर में रटाने से बच्चे को न ठीक इंग्लिश मिलती है, न हिंदी — और आठ साल की उम्र तक वह दादा-दादी से बात करना ही छोड़ देता है, जो घर के भीतर सबसे बड़ा नुकसान है।
‘दो भाषाएं बच्चे को कन्फ्यूज़ कर देती हैं’ — नहीं करतीं। दुनिया की आधी से ज़्यादा आबादी दो या उससे ज़्यादा भाषाओं में पलती है, और भारत में तो तीन आम बात है: घर की बोली, हिंदी और इंग्लिश। हां, कुछ द्विभाषी बच्चे बोलना कुछ महीने देर से शुरू करते हैं, पर यह देरी सामान्य दायरे के भीतर रहती है और तीन-चार साल तक बराबरी हो जाती है। ध्यान बदलने और नियम पकड़ने वाले कामों में द्विभाषी बच्चे अक्सर आगे ही मिलते हैं।
जो बड़े-बुज़ुर्ग सही कहते हैं, उन्हें पूरा श्रेय दीजिए: कहानी सुनाना, कविता और पहाड़े दोहराना, त्योहार पर रिवाज़ों के नाम गिनाना, नाम-जगह-चीज़ और अंताक्षरी खिलाना — दोहराव और खेल भाषा की जड़ हैं, और महंगी भाषा-ऐप्स भी यही तरकीब बेचती हैं। मुहावरे, लोकोक्तियां और गिनती जिस सहजता से नानी सिखा देती हैं, वह किसी वर्कशीट के बस की बात नहीं।
सवाल: घर की बोली — भोजपुरी, मारवाड़ी, हरियाणवी — भी चलाएं या सिर्फ हिंदी? — तीनों साथ चल सकती हैं, बस हर बड़े की भाषा तय हो: दादी भोजपुरी, मम्मा हिंदी, स्कूल इंग्लिश। बच्चा जिससे जो सुनता है, उसी हिसाब से खाने अलग रख लेता है। बोली छोड़ने से बच्चे को इंग्लिश में कोई फायदा नहीं मिलता, दादी से रिश्ता ज़रूर कट जाता है।
सवाल: बच्चा साढ़े तीन साल का है और हिंदी में जवाब नहीं देता, क्या अब देर हो गई? — नहीं। समझ बची है तो बोलना लौट आता है; छह से आठ हफ्ते तक रोज़ 30-40 मिनट का हिंदी वाला समय और बोलने के तय मौके देकर फर्क दिखने लगता है। असली मुश्किल आठ-नौ साल के बाद शुरू होती है, जब बच्चा भाषा को अपनी पहचान और दोस्तों से जोड़ने लगता है।
सवाल: क्या भाषा वाली ऐप या यूट्यूब से हिंदी आ जाएगी? — अकेले नहीं। दो साल से छोटे बच्चे स्क्रीन से भाषा लगभग नहीं सीखते; उन्हें जवाब देने वाला इंसान चाहिए। गाने, कविताएं और ऐप अच्छे सहायक हैं, पर 15 मिनट की आमने-सामने बातचीत 45 मिनट के वीडियो पर भारी है।
सवाल: स्कूल कहता है घर पर इंग्लिश बोलिए, क्या करूं? — स्कूल से लिखकर पूछिए कि दिक्कत क्या है — उच्चारण, शब्द भंडार, या बोलने की हिचक। ज़्यादातर मामलों में जवाब शब्द भंडार होता है, जिसका इलाज रोज़ 10 मिनट की इंग्लिश किताब है, हिंदी बंद करना नहीं। तीन महीने बाद प्रगति दोबारा पूछिए और तब तक घर की भाषा वैसी ही चलने दीजिए।